25 November, 2010

मैं तुम्हारी मौन करुणा..

मैं तुम्हारी  मौन  करुणा  का  सहारा  चाहता  हूँ,
जानता हूँ इस जगत में  फूल की  है  आयु  कितनी,
और यौवन की उभरती सांस में  है  वायु  कितनी,
इस लिए संसार का  विस्तार सारा चाहता हूँ,
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ...

ये उठा कैसा प्रभंजन!! जुड़ गयीं जैसे दिशायें,
एक तरनी, एक नाविक, और कितनी आपदाएं...
क्या करूँ मझधार में ही मैं किनारा चाहता हूँ..
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ...

- रामकुमार वर्मा

सच हम नहीं सच तुम नहीं ..

सच हम नहीं सच तुम नहीं,
सच है सतत संघर्ष ही..

संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या की तुम,
जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृंत से झड कर कुसुम |
जो पंथ भूल रुका नहीं, जो हार देख झुका नहीं,
जिसने प्रणय पाथेय माना, जीत उसकी है रही ||
सच हम नहीं सच तुम नहीं..

ऐसा करो जिससे न प्राणों में कहीं जड़ता रहे,
जो है जहाँ चुपचाप अपने आप से लड़ता रहे |
जो भी परिस्थितियां मिलें, कांटे चुभें कलियाँ खिलें,
टूटे नहीं इन्सान, है सन्देश जीवन का यही ||
सच हम नहीं सच तुम नहीं..

हमने रचा आओ हमी तोड़ दें इस प्यार को,
यह क्या मिलन, मिलना वह जो मोड़ दे मझधार को |
जो साथ फूलों के चले, जो ढाल पाते ही ढले,
वह जिंदगी क्या जिंदगी जो पानी सी बही ||
सच हम नहीं सच तुम नहीं..

अपने हृदय का सत्य अपने आप हमको खोजना,
अपने नयन का नीर अपने आप हमको पोंछना |
आकाश सुख देगा नहीं, धरती पसीजी है कहीं,
हर एक राही को भटक कर ही दिशा मिलती रही ||
सच हम नहीं सच तुम नहीं..

बेकार है मुस्कान से ढकना हृदय की खिन्नता,
आदर्श हो सकती नहीं तन और मन की भिन्नता |
जब तक बंधी है चेतना, जब तक हृदय दुःख से घना,
तब तक न मानूंगा कभी इस राह को ही मैं सही ||
सच हम नहीं सच तुम नहीं..


-जगदीश गुप्त